शादी होने के बाद समझदार पति-पत्नी तय करते हैं कि पहला बच्चा कब पैदा करना है और दूसरा कब पैदा करना है.
उनको कितने बच्चे पैदा करने हैं, ये वही तय करते हैं.
मतलब कि इन्सान ही तय कर रहे हैं कि कितने इन्सान पैदा करने हैं.
इन्सान को पैदा करने में किसी भगवान की मर्ज़ी या भूमिका नहीं है.
चीन की सरकार ने एक ही बच्चे का क़ानून लागू करके करोड़ों बच्चों को पैदा नहीं होने दिया..
इससे साबित होता है कि इन्सानी जन्म या जीवन पे इन्सान का कंट्रोल होता है.
धार्मिक लोग भी परिवार नियोजन के तरीके अपनाते हैं, क्योंकि वे ज़्यादा बच्चे नहीं चाहते,
इससे साबित होता है कि इन्सान को जन्म देना या न देना इन्सान के वश में है, न कि किसी भगवान के वश में..
ये समझना मुश्किल नहीं है कि नर और मादा के द्वारा ही किसी भी जीव का जन्म होता है,
धरती पे जीवन की शुरुआत और जीव विकास के सिद्धांत को समझने के लिये समझ की ज़रूरत होती है,
लोग समझदार होते तो ये बात स्कूल टाइम में ही समझ जाते,
स्कूल में जीव विज्ञान भी पढ़ाया जाता है...
जीव विज्ञान के मुताबिक़, अगर कोई जीव अपने किसी अंग का प्रयोग करना बंद करदे तो वो अंग कमज़ोर होने लगता है, फिर धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है
ज़्यादातर धार्मिक लोग दिमाग़ का प्रयोग नहीं करते, इस लिये उनका दिमाग़ कमज़ोर हो जाता है.. सोचने-समझने वाला हिस्सा बेकार हो जाता है.. उसके बाद उनको कोई लॉजिक और फैक्ट समझ नहीं आता...
रविवार, 9 जुलाई 2017
इन्सानी जन्म या जीवन पे इन्सान का कंट्रोल होता है.
शुक्रवार, 7 जुलाई 2017
जय भीम क्यों ?
जय भीम बोलकर हम कृतज्ञता प्रकट करते हैं उस महामानव के प्रति जिसने हमको सही मायनों में इंसान बनाया और इंसानी अधिकार दिलाये वर्ना उससे पहले हमारा जीवन क्या था ? पशुओ के समान जीवन व्यतीत करते थे हम । हमको पानी नहीं पीने दिया जाता था । हम उस पानी को भी नहीं पी सकते थे जिसको पशु पक्षी पी सकते थे । बहुत से लोग पानी के अभाव में तड़प तड़पकर दम तोड़ देते होंगे और बहुत से गन्दा अशुद्ध पानी पीकर अपने जीवन के लिए संघर्ष करते होंगे । इस स्थिति में उन पशुओं और इंसानों में क्या फर्क रह गया था ? बाबा साहब ने हमको पानी दिलाने के लिए संघर्ष किया इसलिए हम जय भीम बोलते हैं । हमको अछूत बनाया गया । सोचो अगर कोई अछूत बीमार होता होगा तो वो बिना इलाज के ही दम तोड़ देता होगा क्योंकि कोई भी वैद्य उसका इलाज करने नहीं जाता होगा । अगर कोई वैद्य उसको स्पर्श करेगा तो वो अपवित्र हो जायेगा । इस प्रकार इलाज के अभाव में मरीज तड़प तड़पकर मरेगा ही । इस स्थिति से हमको बाबा साहब ने उबारा और इस अमानवीय व्यवहार को गैरकानूनी घोषित किया । बाबा साहब के इन्ही उपकारो से कृतज्ञ होकर हम जय भीम बोलते हैं ।आप सभी से यह आग्रह है कि इस कविता को अवश्य पढे।
घर में बचा ना कुछ भी शेष ।।
खूब कराये यज्ञ और हवन ।
घर बेचकर पहुँच गए वन ।।
खूब घूमें तीर्थ यात्रा ।
घर में बची ना अन्न की तनिक भी मात्रा ।।
खूब गंगा जमुना नहाये ।
लौट के बुद्धू घर को आये ।।
खूब पूजे लक्ष्मी गणेश ।
पैसा बचा ना एक भी शेष ।।
दिया पंडो को भी खूब दान ।
मिला नही कहीं भगवान ।।
पूजे खूब लक्ष्मण राम ।
घर के बिगड़े सारे काम ।।
किये खूब व्रत उपवास ।
अपना शरीर भी रहा ना पास ।।
खूब रखे पत्नी ने करवा चौथ ।
फिर भी पत्नी से पहले पति को आ गयी मौत ।।
खूब पूजे लक्ष्मी दुर्गा और काली माई ।
घर में रही ना एक भी पाई ।।
खूब बजाये मैंने मंदिर में घंटा ।
फिर भी भरा ना मेरा अंटा ।।
खूब चढ़ाये मैंने माला फूल ।
फिर भी साफ़ हुई ना मन की धूल ।।
खूब जलाई मैंने अगरबत्ती और धूप ।
फेफड़ो को धुआं जलाता खूब ।
यदि पूजा-पाठ करने से ही बुद्धि और शिक्षा आती तो पुजारियों की औलादें ही विश्व में वैज्ञानिक-डॉक्टर-इंजीनियर होतो वहम् से बचों अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाओ क्योंकि शिक्षा से ही वैज्ञानिक-डॉक्टर-इंजीनियर और शासक बनते हैं पूजा-पाठ से नहीं अतः वहम् का कोई ईलाज नहीं और शिक्षा का कोई जवाब नहीं
शिक्षित बनो .संगठित बनो. जय भीम साथियों
गौतम ! नाम ही काफी है।
बुधवार, 5 जुलाई 2017
हरामखोर आर्यों की कथा !
नैमिषारण्य, नैमिष और नीमसार यह एक ही नाम है उस जगह के जहां कभी आर्यों की सबसे बड़ी मिशनरी रही, उत्तर भारत में ऋषियों यानी धर्म-प्ररचारकों का सबसे बड़ा गढ़। आप को बताऊं यह बिल्कुल वैसे ही जैसे अठारवीं सदी में योरोप और अमेरिका से आई ईसाई मिशनरियों ने भारत के जंगलों में रहने वाले लोगों के मध्य अपना धर्म-प्रचार किया और उन्हे ईसाई दीन की शिक्षा-दीक्षा दी, वैसे ही यह आर्य चार-पाँच हज़ार पूर्व आकर इन नदियों के किनारे वनों में अपने धर्म-स्थलों की स्थापना कर जन-मानस पर अपना प्रभाव छोड़ने लगे…धर्म एक व्यवस्था…एक कानून है और यह आसानी से जन-मानस को प्रभावित करता है और उनके मष्तिष्क पर काबू भी ! नतीजतन धर्म के सहारें फ़िर यह धर्माचार्य जनता पर अपना अप्रत्यक्ष शासन चलाना शुरू करते है…उदाहरण बहित है…रोम का पोप…भारत में बौद्ध मठ ….इत्यादि…!
दरअसल ये धर्माचार्य आम मनुष्य के अतिरिक्त सर्वप्रथम राजा पर अपना प्रभाव छोड़ते है, राजा उनका अनुयायी हुआ नही कि जनता अपने आप उनसे अभिशक्त हो जाती है, यदि हम इतिहास में झांके को देखेगे..चन्द्रगुप्त मौर्य पर बौद्ध धर्माचार्यों ने अपना प्रभाव छोड़ना शुरू किया वह आशक्त भी हुआ बौद्ध धर्म से किन्तु चाणक्य के डर से वह बौद्ध नही बन पाया, कनिष्क कुषाण था किन्तु आर्यावर्त के स्नातन धर्माचार्यों के प्रभाव से वह शिव यानी महादेव का उपासक हो गया औय ही हाल तुर्किस्तान से आये शकों का था जो महादेव के अनुवायी बन छोटे छोटे छत्रपों के रूप में उत्तर भारत पर राज्य करते रहे । धर्म का वाहक ऋषि जो गुरू होता था राजा और प्रजा का, राम को ही ले तो दशरथ से ज्यादा हक़ वशिष्ठ और विश्वामित्र का था राम पर….जैसा गुरू कहे राजा वही करता था यानी अप्रत्यक्ष रूप से धर्म का ही शासन…चलो ये भी ठीक धर्म कोई भी हो सही राह दिखाता है….लेकिन यदि धर्म के वाहक ही अधर्म के कैंन्सर से ग्रस्त हो जायें तो उस राज्य और वहां के रहने वालों का ईश्वर मालिक…..।
आप सब को इतिहास की इन खिड़कियों में झाकने के लिए विवश करने की वजह थी, मेरा आर्यावर्त में नैमिष के उस महान स्थल का अवलोकन व विश्लेषण जिसने मुझे स्तब्ध कर दिया ! धर्म के विद्रूप दृष्यों और क्रियाकलापों को देखकर..अब न तो वहां कॊई धर्म का सदगुणी वाहक है और न ही जन-कल्याण की भावना, और न ही कोई ऐसा धर्माचार्य जो मौजूदा लोकतान्त्रिक इन्द्र को यानी लाल-बत्ती वालों को प्रभावित कर अच्छे या बुरे (अपने विचारों के अनुरूप) कार्य करवा सकें…यदि कुछ बचा है तो अतीत का वह रमणीक स्थल जहां कभी कल-कल बहती आदिगंगा गोमती का वह सिकुड़ा हुआ रूप जो एक सूखे नाले में परिवर्तित हो चुका है, घने वनों की जगह मात्र छोटे छोटे स्थल बचे हुए है जहां कुछ वन जैसा प्रतीत हो सकता है ! और ऋषि आश्रमों में जहां हज़ारों गायें विचरण करती थी, हज़ारों बच्चे संस्कृत में वेदों की ऋचाओं का उदघोष करते थे और आचार्य धर्म पर व्याख्यान देते थे…इन सबकी जगह अब वह हमारी निश्छल और गरीब जनता को ठगने और उनका आर्थिक व शारीरिक शोषण करने वाले मनुष्य बचे हुए…गन्दे, भद्दे, मूर्ख, चतुर, कपटी, लोभी, लालची, मनुष्य जो सन्त के चोले में हमारे निश्छल, भोले, सादे, व धर्म भक्ति में डूबे लोगों को वह कपटी, साधनहीन सन्त अपनी जीविका और अय्याशी का साधन बनाने की फ़िराक में तत्पर दिखती है, उनकी आंखों में लोभ की चमक साफ़ दिखती है..! बस वे इसी फ़िराक में रहते है कि कब हमारे गांवों से आये हुए तीर्थ-यात्रियों में से कोई व्यक्ति उनके चंगुल में फ़ंसे…!
यहां एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि अतीत में धर्म के सहारे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप पर जनता पर आधिपत्य करने की कोशिश में धर्म कानून की किताब की तरह कार्य करता था, जिसका पालन शासक और शासित दोनो किया करते थे…लोकतन्त्र और शिक्षा के प्रसार ने अब उस धार्मिक शासन ्यव्स्था को ध्वस्त तो कर दिया किन्तु जन-मानस के मस्तिष्क में वह धर्म और उसका डर अभी भी परंपरा के रूप में पीढी दर पीढी चला आ रहा है, हां अब न तो योग्य ऋषि है और न ही अन्वेषणकर्ता मुनि, सन्त इत्यादि बचे है वो लकीर के फ़कीर भी नही है, बस आडम्बर से लबा-लब भरे विषयुक्त ह्रदय वाले मनुष्य धर्म के भेष में शैतान है जिनकी उपमा किसी जानवर से भी नही दी जा सकती..क्योंकि वह जानवर क्रूरता और दुर्दान्तता के शब्दों सेब मानव द्वारा परिभाषित किया जाता है उसके पीछे उसके जीवित रहने की विभीषिका होती है न कि इन कथित सन्तों की तरह कुटिल कूतिनीति, लालच …..
धर्म के नाम पर बड़े बड़े गढ़, आश्रम और तीर्थ, मन्दिर इत्यादि का निर्माण सिर्फ़ व्यक्तिगत महत्वांकाक्षाओं का नतीजा होते है, जन-कल्याण और शिक्षा की भावना गौढ होती है…नतीजतन ये धर्म स्थल व्यक्ति के अंह और उसके द्वारा बनाये गये नियमों को जनता पर थोपने का अड्डा बनते है..
रविवार, 2 जुलाई 2017
क्यों आखिर चीन पाकिस्तान को सपोर्ट करता है
क्यों आखिर चीन पाकिस्तान को सपोर्ट करता है
पाकिस्तान एक छोटा सा देश है ,लेकिन अपना आतंक पूरी दुनिया में फैलाया है,
उसका स्पोर्ट भी दुनिया के बहुत से देश वाले करते है ,जिनमे एक चीन भी शामिल है
क्यों आखिर चीन पाकिस्तान को सपोर्ट करता है , आज मै आप को बताता हूं अगर सही लगे तो मेरा स्पोर्ट कीजियेगा, कही गलत लगे तो मुझे जरूर बताइयेगा,
जैसा की हम सब को पता है कि पाकिस्तन इश्लाम धर्म को मानता है ,और इश्लाम धर्म को केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि दुनॉय में बहुत से देश में लोग मानते हैं,
चीन और भारत दोनों एक साथ ही आजाद हुवा था ,चीन ने बुद्ध को अपना लिया , और भारत ने अंधबिसवास को अपना लिया ,नतीजा सामने है
चीन जिस धर्म को मानता है उस धर्म को भारत के लोगो ने अपमान किया , चीन कैसे भारत का सपोर्ट कर सकता है,
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है ,अगर हम 85% लोग ही मात्र हिन्दू धर्म का त्याग कर दे और बुद्ध को अपना ले ,
तो चीन पाकिस्तान का सपोर्ट करेगा या फिर अपने धर्म वालो का ,
फिर जितने भी बुद्ध धर्म को मानाने वाले देश है वो सभी भारत का सपोर्ट करेंगे क्यों की उनके धर्म के निर्माता का जन्म भारत में हुवा है
आज पूरी दुनिया भारत को 15% मूर्खो की वजह से पूरे भारत को मूर्खो का देश मानती है ,
अगर हम किसी दूसरे देश में जाके बोले की - सूरज को हनुमान नाम के बंदर ने एक बार खा लिया था , तो दूसरे देश वाले क्या सोचेंगे आप खुद ही जानते है,
हमें कैसे भी कर के भारत के सभी मुलनिवासियक को बुद्धिस्ट बनाना होगा ,
जो बौद्धिस्ट नहीं वो मूलनिवासी नहीं हो सकता ,
और उसके दिल में संविधान निर्माता के प्रति कोई सामान आदर नहीं है ,
वो धरती पे एक कलंक है वैसे लोग गुलामी करने के लिए ही पैदा होते है,
अरुण ओबेरॉय
8933861601
www.pakhandwad.blogspot.com
मंगलवार, 27 जून 2017
पहले जानो, फिर मानो
1-किसी भी बात को इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि उसे आपके पूर्वज मानते आये हैं !
2-किसी भी बात को इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि वह बहुत सारी किताबो में लिखी है !
3-किसी भी बात को इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि वह परम्परा से चली आ रही है !
4-किसी भी बात को इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि उसे बहुत सारे लोग मानते हैं !
बल्कि उस बात को मानना चाहिए, जो तर्क की कसौटी पर खरी उतरती हो, परिक्षण में खरी हो, विज्ञानं के तर्क पर खरी हो ! अर्थात : पहले जानो, फिर मानो !
"नास्तिक" होना आसान नही
कोई भी "नासमझ" इंसान "ईश्वर" के अस्तित्व को मानकर फ्री हो जाता है उसके लिए उसे "बुद्धि" की जरुरत नही होती परंतु नास्तिक होने के लिए "दृढ विश्वास और साहस" की जरूरत होती है ऐसी "योग्यता" उन लोगो के पास होती है जिनके पास "प्रखर तर्क बुद्धि" होती है. "अंधश्रद्धा" ऐसा "केमिकल" है जो इंसान को "मूर्ख" बनाने मे काम आता है .
-- पेरियार ई.वी. रामास्वामी
@ हिन्दू धर्म का विचित्र इतिहास @
1- मंदोदरी " मेंढकी " से पैदा हुई थी !
2- " श्रंगी ऋषि " " हिरनी " से पैदा हुये थे !
3- " सीता" " मटकी" मे से पैदा हुई थी !
4- " गणेश " अपनी " माँ के मैल " से पैदा हुये थे !
5- " हनुमान " के पिता पवन " कान " से पैदा हुये थे !
6- हनुमान का पुत्र # मकरध्वज था जो # मछ्ली के मुख से पैदा हुआ था !
7- मनु सूर्य के पुत्र थे उनको छींक आने पर एक लड़का नाक से पैदा हुआ था !
8- राजा दशरत की तीन रानियो के चार पुत्र जो फलो की खीर खाने से पैदा हुये थे
9- सूर्य कर्ण का पिता था। भला सूर्य सन्तान कैसे पैदा कर सकता है वो तो आग का गोला है !
" ब्रह्मा " ने तो 4 वर्ण यहां वहां से निकले हद है !!
" दलित " का बनाया हुआ " चमड़े का ढोल"
# मंदिर में बजाने से मंदिर # अपवित्र नहीं होता!
" दलित " मंदिर में चल जाय तो मंदिर " अपवित्र " हो जाता है।
# उन्हें इस बात सेकोई # मतलब नहीं की # ढोल किस जानवरकी चमड़ी से बना है।
उनके लिए # मरे हुए जानवर की चमड़ी पवित्र है,
पर जिन्दा दलित अपवित्र....!!
" लानत है ऐसे धर्म पर" ....!!!
" बुद्धिजीवी " प्रकाश डाले !! दिमाग की बत्ती जलाओ अंधविश्वास भगाऔ
यदि " पूजा-पाठ " करने से ही " बुद्धि " और " शिक्षा " आती तो...
" पंडों की औलादें " ही विश्व में # वैज्ञानिक-डॉक्टर-इंजीनियर "# होती..!!
" वहम् " से बचों अपने बच्चों को " उच्च शिक्षा " दिलवाओ..#
क्योंकि,
" शिक्षा " से ही " वैज्ञानिक-डॉक्टर-इंजीनियर " और शासक बनते हैं ..!
# " पूजा-पाठ " से नहीं..!
# अतः " वहम् " का कोई ईलाज नहीं ..!!
और
" शिक्षा" का कोई # जवाब नहीं..!!
" शिक्षित बनो " .. " संगठित रहो " .. " संघर्ष करो "
जय भीम नमो बुद्धस्स
ब्राह्मण धर्म और बलात्कार
____ये है सनातन धर्म ____
क्या आप जानते हैं ?
इन्द्र ने - गौतम ऋषि की पत्नी "अहिल्या " के साथ रेप किया !
चन्द्रमा ने - अर्क अर्पण करती ब्रहस्पति की पत्नी "तारा " के साथ रेप किया !
अगस्त्य ऋषि ने - सोम की पत्नी "रोहिणी " के साथ रेप किया !
ब्रहस्पति ऋषि ने - औतथ्य की पत्नी व मरूत की पुत्री "ममता "के साथ रेप किया !
पराशर ऋषि ने - वरुण की पुत्री "काली "के साथ रेप किया !
विश्वामित्र ने - अप्सरा "मोहिनी" के साथ सम्भोग किया !
वरिष्ठ ऋषि ने - "अक्षमाला " के साथ रेप किया !
ययाति ऋषि ने - "विश्ववाची "के साथ रेप किया !
पांडु ने - "माधुरी "के साथ रेप किया !
राम के पूर्वज राजा दण्ड ने - शुक्राचार्य की पुत्री "अरजा "के साथ रेप किया !
ब्रह्मा ने - अपनी बहिन गायत्री और पुत्री सरस्वती के साथ रेप किया !
ऐसी न जानें कितनी घटनाएँ इनके धर्म ग्रन्थों में भरी पढ़ी हैं इस पोस्ट को करने का मेरा एक ही मकसद है मैं हिन्दू धर्म के ठेकेदारों से पूछना चाहता हूँ ?
इन बलात्कारियों का दहन क्यों नहीँ ? और -
"रावण महान " जैसे महा विद्वान शीलवान व्यक्तित्व का जिसने सीता का अपहरण तो किया पर कोई शील भंग नहीँ किया, ऐसे नारी को सम्मान देने वाले "रावण " का दहन आखिर क्यों ?
जागो बहुजन जागो
____ रत्न विचार
भगवान से *न्याय* मिलता,
तो *न्यायालय* नहीं होते।
सरस्वती से *ज्ञान* मिलता,
तो *विद्यालय* नहीं होते।
दुआओ से *काम* चलता,
तो *औषधालय* नहीं होते।
बिन काम किये *भाग्य* चमकता,
तो *कार्यालय* नहीं होते।
मंदिर धर्म के दलालों की *निजी दुकान* है, जो कि कुछ *विशेष जाती* के लोगो को ही फायदा पहुँचाने के लिए है।
वहाँ वही जाते हैं, जो *दिमाग से गुलाम* होते हैं।
सोच बदलो, ब्राह्मणवाद मिटाओ।
इंसान को मान बैठा भगवान
=======================
मैं भी मंदिर बहुत गया हूँ।
मंदिर में रखी मूर्ति के भोग भी बहुत लगाये हैं।
भगवान के चरणों में रूपये भी बहुत रखे हैं।
परंतु किसी भी भगवान को मैंने इंसान की समस्या के लिए दरबार लगाते नहीं देखा l
परंतु कभी किसी भगवान को मैंने भक्त के लिए मंदिर के बंद दरवाजें खोलते हुए नहीं देखा।
कभी मंदिर यानी अपने घर में मोमबत्ती अगरबत्ती चलाते नहीं देखा
मंदिर में हो रहे बलात्कार को कभी रुकते नहीं देखा l
कभी किसी भगवान को मेरे द्वारा चढ़ाये गये भोग को सेवन करते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को पानी पीते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को नहाते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को कपड़ें लेकर पहनते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को टॉयलेट जाते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को उसके हाथ से पैसे पकड़ते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान ने आशीर्वाद देने के लिए मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा।
कभी किसी भगवान ने मुझे गले नहीं लगाया।
कभी किसी भगवान को मैंने मुझे दु:ख-दर्द, परेशानी में मुझे संभालते नहीं देखा।
क्या देखा ?
=======
भगवान के नाम पर भोग खाते ब्राह्मण को देखा।
भगवान के नाम पर पैसे लेते ब्राह्मण को देखा।
भगवान के नाम पर कपड़ें लेते और पहनते ब्राह्मण को देखा।
भगवान के मंदिर में से पैसे उठाते ब्राह्मण को देखा।
भगवान के मंदिर में चढा़ये पैसों से मालामाल होते ब्राह्मण को देखा।
मैं बेवकूफ मंदिर गया भगवान को मानने और मान बैठा इंसान को।
आस्था का सैलाब तो देखों कि जब ब्राह्मण को भगवान को लूटते देखा तो खुश हुआ,
परंतु भगवान के चढ़ावें को खुद उठाने से डरता था कि भगवान पर चढ़ाया हुआ लेना पाप है। भगवान नाराज होकर श्राप दे देगा।
क्या मानसिकता थी कि भगवान के नाम का तो ब्राह्मण ही ले सकता हैं, मैं ले लूँ तो चोर, लुटेरा, अधर्मी कहलाउंगा।
वाह रे इंसान, तू भगवान की मूर्ति के चक्कर में एक नालायक, चोर, लुटेरे इंसान को भगवान मान बैठा।
इंसान को भगवान मानने की गलती करने के लिये मुझे क्षमा करें।
अंग्रेजों को बुरा क्यों कहते हो
इसे पढें -
५) *नरमेध यज्ञ*:- रिग्वेद के आधार पर अनाथ या निर्धन बच्चे की यज्ञ में बली चढाने की प्रथा को 1845 मे एक्ट 21 बनाकर बंद किया गया ।
अपनी माताओं की मनौती की कि हे- महादेव! हमें संतान हुई तो पहली संतान आपको भेंट देंगे और इसके तहत नव- युवक अपने को पहाड़ से कूदकर जान देते थे कानून बनाकर बंद की ।. —
ये है कथित हिन्दू धर्म की ब्राह्मणों द्वारा बनाई कुछ प्रथाए।
*"कहीं हम भूल न जाएँ*
हिन्दू धर्म में वर्ण, वर्ण में शूद्र, शूद्र में जाति, जाति में क्रमिक उंच नीच... और ब्राह्मण के आगे सारे नींच.. *अब गर्व से कैसे कहें कि हम हिन्दू हैं*❓
जाति तोड़ो...समाज जोड़ो
*धर्म नहीं, अधिकार चाहिए*
सोमवार, 26 जून 2017
हिन्दू धर्म का सत्य
1) यजुर्वेद वेद में लिखा है कि धरती एकदम चपटी है
अगर आप भागवत पुराण अध्याय 5 श्लोक नबंर 1/33 पढते हैं उसमें लिखा है कि धरती पर सात समुद्र पाए जाते हैं जो निम्न हैं :
खारा जल का समुद्र ,
ईख का रस ,
शराब का समुद्र ,
घी का समुद्र ,
दूध का समुद्र
मट्ठा का समुद्र और
मीठे जल का समुद्र
Q) अब आप ही बताओ हिंदू भाईयो एेसे समुद्र आप ने कहा देखे हैं ???
2) अगर आप भागवत महापुराण अध्याय 10 श्लोक नबंर /90/42 पढते हैं उसमें लिखा है कि महाराजा उग्रसेन के एक युद्ध मे उसके सैनिकों की संख्या 10000000000000 थी आप बताओ भाईयो आज पूरी दूनिया की आबादी लगभग 8 अरब है ।
Q) आप बताओ हिंदू भाईयों क्या है ये ???
3) अगर आप देवी भागवत पुराण पढते हैं उसमें लिखा है कि धरती पर एक एेसा आम का पेड पाया जाता है जिसकी उँचाई 9,900 मील है ।
Q) क्या कोई हिंदू भाई बता सकता कहाँ वो पेड ????
4) अगर आप भागवत महापुराण 8/24/44 पढते हैं उसमें लिखा है कि (एक शिृंगधरो मतस्य हैमो नियुत्त योजन) अथार्त एक सींग वाली मछली जिसकी लम्बाई 6 लाख मील है ।
Q) कोई हिंदू बता सकता है कहाँ है वो मछली ?????
5) पोराणिकों के अनुसार हिमालय की चौड़ाई 256,000 मील है जबकि धरती की चौड़ाई एशिया से कन्याकुमरी से उतरी ध्रव तक 8,000 मील ही है पौराणिक कथाओं मे हिमालय पर्वत की लम्बाई 128,000 मील बताई है जबकि हिमालय पर्वत की लम्बाई 1500 मील है ।
Q) अब सवाल ये पैदा होता है कि जवाब दो अगर सच्चे हो ?????
6) मेरे हिंदू भाईयों अगर आप भागवत महापुराण अधायाय 5 श्लोक नंबर 24/2 (5/24/2) पढते हैं उसमें लिखा है कि सूरज का आकार 30 हजार मील है , जबकि चाँद का आकार 36 हजार मील है ।
जानिए अछूत कब और क्यों बने हिन्दू-
क्या आपको पता है की अछूतो को सबसे पहले 1911 की जनसँख्या गणना में हिन्दू धर्म में शामिल किया गया था ?
उससे पहले की जनसँख्या गणना में अछूत हिन्दू नहीं कहलाते थे बल्कि अवर्ण थे , यानी की चारो वर्णों से बाहर थे जो हिन्दू नहीं थे और हिन्दू धर्म के लोग उन्हें हिन्दू नहीं सिर्फ अछूत मानते थे ।
अछूतो को हिन्दू धर्म में शामिल करने की हिन्दुओ की मज़बूरी क्या थी? क्या ऐसा कारण था की जो हिन्दू पहले अछूतो को हिन्दू ही नहीं मानते थे अचानक उन्हें हिन्दू मानने लगे और जनसँख्या गणना में उन्हें हिन्दू कहलवाने लगे?
इसके दो कारण थे , पहला कारण था जनसँख्या के आधार पर मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग रख दी थी , अब यदि अछूतो को हिन्दुओ से अलग कर दिया जाए तो कितनी संख्या कम हो जायेगी हिन्दुओ की ... अत: अपनी जनसँख्या अधिक दिखाने के लिए मजबूरन हिन्दू धर्म के ठेकेदारो ने अछूतो को सरकारी आंकड़ो में हिन्दू लिखवाना शुरू कर दिया , पर उनका व्यवहार अछूतो के साथ पूर्व जैसा बना रहा ।
दूसरा कारण था की मुसलमनो को देख कर अछूतो में भी पृथकनिर्वाचन की मांग जोर पकड़ रही थी , यदि अंग्रेज अछूतो की बात मान लेते और पृथक निर्वाचन मताधिकार अछूतो को मिल जाता तो संभव था की मुसलमनो की तरह अछूतो को भी देश का अलग हिस्सा मिल गया होता , तब उस समय देश के दो नहीं तीन हिस्से होते ।
हिन्दु ठेकेदारो ने दोहरी चाल चली, अछूतो को हिन्दू भी बना लिया और उनका हक़ भी नहीं दिया ।
आरक्षण का विरोध करने वाले ये नहीं जानते की यदि आरक्षण नहीं दिया गया होता तो अछूतो को मुसलमानो की तरह अलग हिस्सा मिल गया होता ।
आरक्षण
Q) मेरे हिंदू भाईयों आप बताओ सूर्य का आकार बडा है या चाँद का आप इसे विज्ञान से साबित करो??????
7) रामायण मे लिखा है कि रामायण की घटनाएँ 12 लाख 96 हजार वर्ष पूर्व घटी जबकि विज्ञान से पता चलता है कि पृथ्वी पर आए मनुष्य को 15 से 20 हजार साल लगभग हुए हैं ।
Q) हिंदू भाईयो जवाब दो ?????
8) वेदों मे लिखा है कि पृथ्वी साँप के फन पर टिकी है । मेरे हिंदू भाइयों आप इसे विज्ञान से साबित करो ????
9) अगर आप भागवत स्कंध 5 , अध्याय 22 में लिखा है कि सूर्य के 3 लाख मील उपर चाँद है और सूर्य के सबसे नजदीक पृथ्वी है ।
भाईयो आज का विज्ञान क्या कहता है हम सब जानतें हैं । भागवत पुराण में समुद्रों का क्षेत्रफ़ल का योग 254 लाख योजन बताया है (एक योजन में 8 मील होते हैं ) जबकि समस्त पृथ्वी का विस्तार 50 करोड़ योजन है ।
Q) भाईयो आप बताओ ये बातें वेद, पुराणों में किसने लिखीं हैं क्या भगवान ने लिखी ?????
10) अगर आप यजुर्वेद अध्याय ३३ श्लोक नबंर ४३ पढते हैं उसमें लिखा है कि पृथ्वी ठहरी हुई है और सूर्य पृथ्वी के चारों और चक्कर लगाकर पृथ्वी के अंधकार को दूर करता हैं ।
11) यजुर्वेद वेद २/१२/१२ पढते हैं उसमें लिखा है कि धरती एकदम चपटी है ।
Q) आखिर इतना बढ़ा झूटा और बेवकूफ कोई भी इस दुनिया में और कौन हो सकता है?
ये हिन्दू धर्म नही बल्कि लोगों बेवकूफ और मुर्ख बनाने का कुधर्म है।
धर्म के नाम पर अंधे न बनें एक जागरूक ईंसान बनें
स्वभिमान बाकी है तो ख़ड़े हो जाओ
मौर्यवंश के अनीतिम राजा ब्रहद्रथ की धोखे हत्या करके राजा बना ब्राह्मण पुष्यामित्रशङ्ग ने मनु के नाम से नीचता शोषड़ अपमान अछूत बंचित व घृणा की गंदी गुलामी का संविधान लिखा ,,,,, मनुस्मृति,,,,, और तलवार की दम पर थोप दिया मूलनिवासियो पर। इसी गनदगी को सिद्ध करने के लिए तमाम झूठी झूठी कहानिया लिख दी।
जिनका सीधा मतलव था है कि मूलनिवासी और समस्त औरत जात को नीच कुजात अछूत बंचित घृणित सिद्ध किया जाए। और ब्राह्मण को पूज्य, श्राप व वरदान का मालिक, भगवान का बाप या गुरु तथा दान मान का मालिक सिद्ध किया जाए। साथ ही कही कही क्षत्रिय व वैस्य को भी डाल दिया जिससे यह सिद्ध हो कि ये तो ब्राह्मण के पैर छूकर मूलनिवासी को शोषड़ करने व ब्राह्मणों को दान देने के लिए बने है।।।।।।
बस यही सिद्धांत उन कहानियों का आपके असली पुराजो के ऊपर हरामियो ने अपने नकली पूर्बजों को वैठा दिया।।।।।
आपके पूर्बजों को राक्षश पापी व अत्याचारी बता दिया और अपने नकली काल्पनिक बाप को देवता भगवान बनाकर थोप दिया।।।।।
पहले तो आपके पास यह अधिकार ही नही था कि आप विरोध कर पाते। लेकिन आज आप समर्थ है, आपके पास संविधान है, वोट का अधिकार है, संख्याबल भी है। फिर भी गनदगी जीवित है। ।।।
अगर आपमि जरा सा स्वाभिमान बाकी है तो खड़े हो जाओ और अपने पूर्बजों के माथे पर हरामियो द्वारा लगाया गया नीचता के कलंक का टीका मिटा दो। जला दो हरामियो की लिखित में थोपी गयी गनदगी।
रविवार, 25 जून 2017
महाभारत
इस महान ग्रन्थ में ऐसी-ऐसी गप्पे हांकी गई है कि कोई भी समझदार व्यक्ति इन्हें सत्य नही मान सकता। उदाहरण के लिए देखिये:-----
1. घृताची नामक अप्सरा को नग्नावस्था में देखकर भारद्वाज ऋषि का वीर्यपात हो गया,जिसे उन्होंने दोने में रख दिया,उससे द्रोणाचार्य पैदा हुवे
(महाभारत,आदिपर्व,अ०129)
2. ऋषि विभाण्डक एक बार नदी में नहा रहे थे,तभी उर्वशी को देखकर उनका वीर्य स्खलित हो गया।नदी के उस वीर्य मिश्रित पानी को एक मृगी पी गई।उसने एक मानव शिशु को जन्म दिया,यही श्रृंग ऋषि कहलाये।
(महा० वनपर्व,अ० 110)
3. राजा उपरिचर का एक बार वीयपात हो गया।उसने उसे दोने में डालकर एक बाज के द्वारा रानी गिरिका के पास भेजा।रास्ते में किसी दूसरे बाज ने उस पर झपट्टा मारा,जिससे वह वीर्य यमुना नदी में गिर गया और एक मछली ने निगल लिया। इससे उस मछली ने एक लड़की को जन्म दिया।लड़की का नाम सत्यवती रखा गया जो महाऋषि व्यास की माँ थी। (महा०आदिपर्व,अ०166,15)
4. महाऋषि व्यास हवन कर रहे थे और जल रही आग में से धृष्टधुम्न और द्रोपदी पैदा हुए। (महा०आदिपर्व,166,39-44)
5. महाराज शशि बिंदु की एक लाख रानिया थी।हर रानी के पेट से एक-एक हजार पुत्र जन्मे।कुल मिलाकर राजा के 10 करोड़ पुत्र हुवे।तब राजा ने एक यज्ञ किया,और हर पुत्र को एक-एक ब्राह्मण को दान कर दिया,हर पुत्र के साथ सौ रथ और सौ हाथी दिए।( कुल मिलाकर 10 करोड़ पुत्र,10 करोड़ ब्राह्मण,10 अरब हाथी,10 अरब रथ),इसके अलावा हर पुत्र के साथ 100-100 युवतियां भी दान दी।। (महा०द्रोणपर्व,अ०65 तथा शांतिपर्व 108)
6. एक राजा हर रोज प्रातः एक लाख साठ हजार गौएँ, दस हजार घोड़े और एक लाख स्वर्णमुद्राएँ दान करता था,यह काम वह लगातार 100 वर्षो तक करता रहा।
7. राजा रंतिदेव की पाकशाला में प्रतिदिन 2000 गायें कटती थी।मांस के के साथ -साथ अन्न का दान करते-करते रंतिदेव की कीर्ति अदुतीय हो गयी।
(महाभारत आ०208,वनपर्व,8-9)
8. संक्रति के पुत्र राजा रंतिदेव के घर पर जिस रात में अतिथियों ने निवास किया,उस रात इक्कीस हजार गायों का वध किया गया।। (द्रोण पर्व,अ०67,श्लोक 16)
9. राजा क्रांति देव ने गोमेध यज्ञ में इतनी गायोँ को मारा कि रक्त,मांस,मज्जा से चर्मण्यवती नदी बह निकली।। (द्रोण पर्व अ०67,श्लोक,5)
यह है हमारी प्राचीन सभ्यता जिस पर हमें गर्व है।
महाभारत में वर्णित कथाओं को सत्य मानने वालो को यह भी समझना चाहिए की यह कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नही,बल्कि,एक कवि की कल्पना है। महाभारत लिखने वाले ने इसे स्वयं एक काव्य कहा है। देखे:-----
1. वेदव्यास बोले ,"मैंने यह काव्य रचा है।"
(महा०आदिपर्व,श्लोक 61)
2. ब्रह्मा ने कहा, "क्योंकि तूने स्वयं इसे काव्य कहा है,अतः यह काव्य की कहा जाएगा।"
(महा०आदिपर्व, अ०1,श्लोक72)
जब स्वयं महाभारतकार इसे काव्य कहता है,तो फिर हम क्यों इसे ऐतिहासिक ग्रन्थ घोषित करते है?सत्ता के भूखे कुछ मानवों ने अपने स्वर्थो को किसी भी हद तक जाकर प्राप्त करने की लालसा में,एक साधारण कथा को आधार बनाकर लेखक ने अपनी कल्पनाशीलता का भरपूर प्रयोग करते हुए हारने वाले पक्ष की निंदा और विजेता पक्ष की खुद स्तुति की है।
विजेता की स्तुति करते-करते उसे ईश्वर का दर्जा दे दिया। जुए में अपनी पत्नी को हार जाने वाले युधिष्टर धर्मराज हो गए,और भिखारी तक को अपना सब कुछ दान कर देने वाला कर्ण निंदनीय हो गए।
इसी कर्ण को धोखे से मरवा देने वाले कृष्ण भगवान् बना दिए गए,जिन्होंने खांडव बन को उसमे रहने वालों लोगो समेत जलवा दिया। कुरुखेत्र के युद्ध में निष्पक्ष होने का ढोंग करके अपने बहनोई अर्जुन का साथ दिया,और उन्हें उकसाकर अर्जुन के ही भाइयों ,गुरुओं,रिश्तेदारों का खून करवा दिया।
लेखक को सदैव निष्पक्ष होना चाहिए ,परन्तु इस ग्रन्थ के रचयिता में निष्पक्षता का अभाव रहा है,शायद इसमें उसकी मज़बूरी रही होगी ,क्योंकि विजेता पांडवो के राज में ही आखिर उनको अपना ग्रन्थ लिखना पड़ा होगा,तो चापलूसी आवश्यक थी।
पूरा महाभारत ही पक्षपात पर आधारित है।अगर तथाकथित भगवान् श्रीकृष्ण निष्पक्ष होते तो गीता में मरने मारने की अर्जुन को प्रेरणा देने के बजाय उन्हें थोड़े में संतोष की सीख देते।कौरवों की तरफ से लड़ने वाले उनके सेनापति भीष्म भी अगर निष्पक्ष होते तो भी इतना खून खराबा न होता।
महाभारत में वर्णित कथाओं में ब्राह्मणों का खूब महामंडन किया गया है। इसमें वर्णित कथाओं का एकमात्र उद्देश्य लोगो को उल्लू बनाकर अपना हलवा मांडा सीधा करना था, जो ब्राह्मणों ने महाभारत नामक ग्रंथ को भगवान् गणेश द्वारा लिखित ग्रन्थ घोषित करके किया।
आज भी महाभारत के नाम पर लोगो को लूटने वालों की कोई कमी नही है।भव्य कृष्ण मंदिर बनते है, रासलीलाओं का आयोजन होता है,और महाभारत की सत्यता का ढिंढोरा पिटा जाता है।,जबकि इसके पढ़ने वाले 1% भी नही होते और इसे बिना पढ़े ही सोलह आने सत्य मान लेते है।।
इस ग्रन्थ को व्यास ने काव्य के रूप में रचा है। एक राजपरिवार के अंदरूनी झगडे को अपनी कल्पनाशीलता के द्वारा ग्रन्थ का रूप दिया। अब यह हमारा बौद्धिक दिवालियापन है, जो हम एक कवि की कल्पना को सच माने।
ब्राह्मण विदेशी है प्रमाण
1. ऋग्वेद में श्लोक 10 में लिखा है कि हम (वैदिक ब्राह्मण ) उत्तर ध्रुव से आये हुए लोग है। जब आर्य व् अनार्यो का युद्ध हुआ ।
2. The Arctic Home At The Vedas बालगंगाधर तिलक (ब्राह्मण) के द्वारा लिखी पुस्तक में मानते है कि हम बाहर आए हुए लोग है ।
3. जवाहर लाल नेहरु ने (बाबर के वंशज फिर कश्मीरी पंडित बने) उनकी किताब Discovery of India में लिखा है कि हम मध्य एशिया से आये हुए लोग है। यह बात कभी भूलना नही चाहिए। ऐसे 30 पत्र इंदिरा जी को लिखे जब वो होस्टल में पढ़ रही थी।
4. वोल्गा टू गंगा में “राहुल सांस्कृतयान” (केदारनाथ के पाण्डेय ब्राहम्ण) ने लिखा है कि हम बाहर से आये हुए लोग है और यह भी बताया की वोल्गा से गंगा तट (भारत) कैसे आए।
5. विनायक सावरकर ने (ब्राम्हण) सहा सोनरी पाने “इस मराठी किताब में लिखा की हम भारत के बाहर से आये लोग है।
6. इक़बाल “काश्मीरी पंडित ” ने भी जिसने “सारे जहा से अच्छा” गीत लिखा था कि हम बाहर से आए हुए लोग है।
7. राजा राम मोहन राय ने इग्लेंड में जाकर अपने भाषणों में बोला था कि आज मै मेरी पितृ भूमि यानि अपने घर वापस आया हूँ।
8. मोहन दास करम चन्द गांधी (वेश्य) ने 1894 में दक्षिणी अफ्रीका के विधान सभा में लिखे एक पत्र के अनुसार हम भारतीय होने के साथ साथ युरोशियन है हमारी नस्ल एक ही है इसलिए अग्रेज शासक से अच्छे बर्ताव की अपेक्षा रखते है।
9. ब्रह्म समाज के नेता सुब चन्द्र सेन ने 1877 में कलकत्ता की एक सभा में कहा था कि अंग्रेजो के आने से हम सदियों से बिछड़े चचेरे भाइयों का (आर्य ब्रह्मण और अंग्रेज ) पुनर्मिलन हुआ है।
इस सन्दर्भ में अमेरिका के Salt lake City स्थित युताहा विश्वविधालय (University of Utaha’ USA) के मानव वंश विभाग के वैज्ञानिक माइकल बमशाद और आंध्र प्रदेश के विश्व विद्यापीठ विशाखा पट्टनम के Anthropology विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा सयुक्त तरीको से 1995 से 2001 तक लगातार 6 साल तक भारत के विविध जाति-धर्मो और विदेशी देश के लोगो के खून पर किये गये DNA के परिक्षण से एक रिपोर्ट तैयार की। जिसमें बता गया कि भारत देश की ब्राह्मण जाति के लोगों का DNA 99:96 %, कश्त्रिय जाति के लोगों का DNA 99.88% और वेश्य-बनिया जाति के लोगो का DNA 99:86% मध्य यूरेशिया के पास जो “काला सागर ’Blac Sea” है। वहां के लोगो से मिलता है। इस रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकालता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-बनिया विदेशी लोग है और एस सी, एस टी और ओबीसी में बंटे लोग (कुल 6743 जातियां) और भारत के धर्म परिवर्तित मुसलमान, सिख, बुध, ईसाई आदि धर्मों के लोगों का DNA आपस में मिलता है। जिससे साबित होता है कि एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्म परिवर्तित लोग भारत के मूलनिवासी है। इससे यह भी पता चलता है कि एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्मपरिवर्तित लोग एक ही वंश के लोग है। एस सी, एस टी, ओबीसी और धर्म परिवर्तित लोगों को आपस में जाति के आधार पर बाँट कर ब्राह्मणों ने सभी मूलनिवासियों पर झूटी धार्मिक गुलामी थोप रखी है। 1900 के शुरुआत से आर्य समाज ब्राह्मण जैसे संगठन बनाने वाले इन लोगो ने 1925 से हिन्दु नामक चोला पहनाकर घुमाते आ रहे है। उक्त बात का विचार हमे बहुत ही गहनता से करने की आवश्यकता है। राष्ट्रिय स्वयं सेवकसंघ के जरिये 3% ब्राह्मण 97% मूलनिवासी भारतीयों पर पिछ्ले कई सालों से राज करते आ रहे हैं।
बुधवार, 21 जून 2017
हरिजन किसे कहते है ?
दोस्तों खुद को हरिजन कहना बंद करो.. क्या आपको पता है हरिजन किसे कहते है? आज मैं आपको बताता हूँ.. हरिजन किसे बुलाते है... इन तथाकथित ब्राह्मणों के एक और शर्मसार कर देने वाला कारनामा आपके सामने प्रस्तुत है... ये बात है देव दासी प्रथा की।
देवदासी प्रथा ब्राह्मणों के इतिहास का और संस्कृति का एक पुराना और काला अध्याय है, जिसका आज के समय में कोई औचित्य नहीं है। इस प्रथा को ख़त्म कर के उन औरतों और बच्चियों के भविष्य की नींव को मजबूत होना बहुत आवश्यक है.. जो इस प्रथा कि शिकार हुई है....
देवदासी प्रथा किसे कहते है? वो महिलाएं जो धर्म के नाम पर दान कर दी जातीं हैं और फिर उनका जीवन धर्म और शारीरिक शोषण के बीच जूझता रहा... जो सारी जिंदगी इन ब्राह्मणों और मंदिर के पुजारियों की हवस का शिकार बनती रहती है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये घिनौनी प्रथा आज भी जारी है. आज भी आंध्र प्रदेश में, विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में दलित महिलाओं को देवदासी बनाने या देवी देवताओं के नाम पर मंदिरों में छोड़े जाने की रस्म चल रही है. “देवदासी बनी महिलाओं को इस बात का भी अधिकार नहीं रह जाता कि वो किसी की हवस का शिकार होने से इंकार कर सकें”... जिस शारीरिक शोषण के शिकार होने के सिर्फ जिक्र भर से रुह कांप जाती हैं, उस दिल दहला देने वाले शोषण का सामना ये देवदासियां हर दिन करती हैं। देवदासी प्रथा भारत के दक्षिणी पश्चिम हिस्से में सदियों से चले आ रहे धार्मिक उन्माद की उपज है. जिन बालिकाओं को देवी-देवता को समर्पित किया जाता है, वह देवदासी कहलाती हैं। देवदासी का विवाह देवी-देवता से हुआ माना जाता है, वह किसी अन्य व्यक्ति से विवाह नहीं कर सकती। सभी पुरुषों में देवी-देवता का अक्स मान उसकी इच्छा पूर्ति करती हैं और ये घिनौनी प्रथा ब्राह्मणों द्वारा रचित है... इस घिनौनी प्रथा में एक और शब्द जुडा हुआ है.. जो पिछड़े वर्ग के ऊपर एक मोहर की तरह लगा दिया गया है.. जिस से काफी लोग अनजान होंगे ! दोस्तो देव दासी अकसर मंदिर के पुजारी की हवस का शिकार होती है और जब पुजारी का मन भर जाता तो वो अन्य लोगो को भी इस देव दासी का भोग करने के लिए भेजता और कमाई भी करता था/ है... तो ईन देवदासियों के बच्चे होना भी आम बात है पर उन बच्चो को कोई बाप का नाम नही देता था ना मंदिर का पुजारी और ना ही वो लोग जो देवदासियों को अपनी मर्दानगी से रौंदते है..... उन बच्चो को भगवान का बच्चा कहा जाता था यानी के “हरीजन” जो पिछड़े लोगो के ऊपर जाति बना के थोप दिया गया है हरीजन शब्द देवदासियों मे से पैदा हुआ शब्द हे जिसे गांधी ने पिछड़े वर्ग के ऊपर जाति बना के थोप दिया जिसको आज भी पिछड़े वर्ग के लोग ढो रहे है दोस्तो हरीजन का एक मतलब “बन्दर के बच्चे” भी होता है.. क्योकि संस्कृत में हरी बन्दर को कहा जाता है... देवदासियों के बच्चों के लिए प्रयोग होने वाला शब्द कुछ मनुवाद के पुजारियों ने पिछड़े लोगो के ऊपर थोप दिया जिसका सही अर्थ होता है “नाजायज” जिसके बाप का पता ना हो उसे हरीजन कहा गया... जो दोस्त इस बात से अनजान हो और अगर किसी पिछड़े वर्ग को हरीजन कहने से पहले हकीकत जरुर जान ले.. इस शब्द का उपयोग कभी भी किसी के लिए ना करे और ब्राह्मणो के पाखंड की हकीकत जाने और सभी से शेयर करे !.
Arun Gautam
8933861601
